Sunday, 5 January 2014

एक शाम…..



ये शाम क्या  तेरे ही गीत गा रही है ...
मुझको जो तेरी इतनी याद रही है 
हवा के संग बहती खुशबू   गुनगुना रही है 
तू भी यादों में मेरी खोती  जा रही है ..!!!

ये जादुई खुशबू जिसने सबको दीवाना बनाया है ...
खामोश होकर खुद सबको हसना सिखाया है 
यूँ हवाओ के संग मुझको तेरा छूकर जाना 
अच्छा नहीं है यूँ  छुपकर  मुझको सताना !!!

डरते हो क्यूँ भला  शरमाते  हो क्यूँ ....
आओ पास बैठो मेरे दूर जाते हो क्यूँ 
हर शाम खूबसूरत एक मीठा एहसास है 
कहने को दिल में मेरे हजारों जज्बात  है !!!

चलो आज शाम सबको खुश कर दें ....
तेरी मुस्कुराहट के रंग वादियों में भर दें 
इल्तजा है आज मेरी तुमसे ये 'शुभम '
पास बैठो मेरे तुम दूर जाना नहीं ...!!!!!!

कृति: विष्णु मणि पाण्डेय (शुभम्)

5 comments:

  1. Waah..tumhare bhi ehsaas Zabardast hain Bhai!! Bahut pyari kavita hai..loved it! Keep writing!

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  2. kya baat hai...subah subah hee romantic mood me... <3 khoobsurat lines hai...aur har line me pyaar saaf jhalak rha hai...ahmm ahmm kaun hai wo ladki rahti hai wo khaan?

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    1. thank you dear, ab kya bataye woh kaun hai kahan rehti hai... yahi bataun ya personal talk mein bolu.. :)

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  3. बहुत ही खूब । भावों को पंक्ती दर पंक्ती प्रसार मिल रहा है भुत मर्मस्पर्शी लेखन विष्णु भाई

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