तेरी तरह मैं भी मुस्कुराना चाहता हूँ ....
सारे गम भुला के खिलखिलाना चाहता हूँ ....
कितने आराम से कहकर मुझे गैर तुम ...
चैन से सोते हो कैसे, इसे अब जानना चाहता हूँ ...!!!
जुबान की बात गलत हो सकती है मान लूँ तुम्हारे...
फिर भी तेरी आँखों की हकीक़त को पहचानना चाहता हूँ....
रक्स करती थी जो हमेशा मेरी ही बातों में ....
आज चर्चा हुआ कैसे वोह गैर, यह जानना चाहता हूँ...
तेरी तरह मैं भी मुस्कुराना चाहता हूँ.........!!!
कहो तुम देख कर इक बात मेरी आँखों में...
कही तुम कोई सच तोह नहीं छुपाती अपनी बातों में ....
अगर यह झूठ है तोह, मुझे क्यों यह सच लगता है ....
बेवजह एक बात पे ही मन क्यों अटकता है....
ऐसी ही अपनी कुछ उलझनों को सुलझाना चाहता हूँ .....
व्यर्थ हुए इन आंसुओ का हिसाब चाहता हूँ....
तेरी तरह मैं भी मुस्कुराना चाहता हूँ ....!!!
शुभम एक बार ही सही ...
भले वोह झूठ क्यों न हो...
तेरी तरह मैं भी मुस्कुराना चाहता हूँ...
सारे गम भूला के मुस्कुराना चाहता हूँ ....!!!!
कृति : विष्णु मणि पाण्डेय (शुभम)