Thursday, 29 May 2014

कुछ मांगें..



एक बगिया से कुछ सपने चुने...
कुछ तुम्हारे कुछ अपने चुने..l
 
कुछ खुशबु बटोरी खुशियों की तुम्हारे लिए.. 
कुछ मीठी यादो के लम्हे अपने लिए बुने..l

मासूमियत उठाई है तुम्हारी, सुबह की ठंडी ओस से 
तेरे चेहरे की सादगी मिली रात की चांदनी से...l
बगिया की नर्म हवाओं से अपने लिए प्यार बटोरा है...
तेरी मुस्कराहट की दस्तक देता ये नया सवेरा है...l

सरसराती हुई पत्तियों से तेरी पायल की झनकार मांगी है 
इस नर्म एहसास में तेरी कुछ याद मांगी है..l
इन चिड़ियों की चहक से जीवन में साज़ माँगा है.
खिलती हुई कलियों से मैंने ये गहन-ऐ-ताज माँगा है 
आदतन पहने बैठा हूँ जो खुशियों का लिबास शुभम्...
बस उसी में साथी मैंने तेरा भी साथ माँगा है...l

कृति: विष्णु मणि पाण्डेय (शुभम्)

Monday, 6 January 2014

दूर सही...



सफ़र है  यह कट ही जायेगा ....
लम्हा लम्हा हर ज़ख्म भर  ही जायेगा ....
परिंदा जो किसी कारण से आशियाँ छोड़ गया .....
शाम ढलने पर वोह भी लौट आएगा .....
जिद्द में किसी की  तामुँर  इंतज़ार करना ....
बिना बात हर पल उसके यादो में रहना ....
खुश रहो तुम खुद की प्यारी दुनिया में ...
देखना बेवाफाई का मलाल उससे भी ज़रूर होगा ...
दूर सही मगर उसे अब  भी मुझसे प्यार होगा .....!!!!!

जहाँ बातों  में  प्यारी यादें कुरेदता होगा ....
किसी को देख वोह भी मुझे सोचता होगा ...
कई  बार उलझन में मुझे पुकारता होगा ...
खामोश चेहरे से मुझे आज भी निहारता होगा ....
लेके कई सवाल दिल में वोह चुप सा ...
दोस्तों को देख ज़रूर मुस्कुराता होगा ..
मेरी जैसी बातों में  उसका भाव भड़कता होगा ...
मोहब्बत की बात पे उसका हृदय धड़कता जाता होगा ...
दूर सही मगर उसे अब  भी मुझसे प्यार होगा .....!!!!!

मेरी तरह देर तलक वोह भी जगता होगा ...
अँधेरी रातों में छत पे कुछ तोह तकता होगा ...
खामोश रातो में अश्को से तकिया भिगोता होगा ...
चुपके से खुद में सिमट के वोह भी सोता होगा ...
खाव्बों में उसके शायद आज भी मेरा ही एहसास होगा ...
सुबह उठकर वोह भी मुझे ढूंढता होगा ...
शुभम इस बात का उसे भी कुछ एहसास होगा ...
दूर सही मगर उसे अब भी मुझसे प्यार होगा ....!!!!

कृति : विष्णु मणि पाण्डेय ( शुभम्)

Sunday, 5 January 2014

एक शाम…..



ये शाम क्या  तेरे ही गीत गा रही है ...
मुझको जो तेरी इतनी याद रही है 
हवा के संग बहती खुशबू   गुनगुना रही है 
तू भी यादों में मेरी खोती  जा रही है ..!!!

ये जादुई खुशबू जिसने सबको दीवाना बनाया है ...
खामोश होकर खुद सबको हसना सिखाया है 
यूँ हवाओ के संग मुझको तेरा छूकर जाना 
अच्छा नहीं है यूँ  छुपकर  मुझको सताना !!!

डरते हो क्यूँ भला  शरमाते  हो क्यूँ ....
आओ पास बैठो मेरे दूर जाते हो क्यूँ 
हर शाम खूबसूरत एक मीठा एहसास है 
कहने को दिल में मेरे हजारों जज्बात  है !!!

चलो आज शाम सबको खुश कर दें ....
तेरी मुस्कुराहट के रंग वादियों में भर दें 
इल्तजा है आज मेरी तुमसे ये 'शुभम '
पास बैठो मेरे तुम दूर जाना नहीं ...!!!!!!

कृति: विष्णु मणि पाण्डेय (शुभम्)